आप सब को यक़ीनन ऐसा तजुर्बा हुआ होगा कि भीड़ भरे कमरे में अचानक किसी के आंखें टकरा गईं और पता चला कि वो इंसान एकटक आप को देख रहा है.
ये मंज़र किसी फ़िल्म का भले लगे, पर असल दुनिया में भी हम सब इस तजुर्बे से गुज़रते हैं. और नज़रें चार होते है, आस-पास की दुनिया धुंधली हो जाती हैं.
साफ़ दिखती है, तो वो नज़र, जो आपकी आंखों से टकराई है. ऐसा लगता है कि जिन लोगों के नैना लड़े हैं, वो कुछ पलों के लिए ज़हनी तौर पर एक-दूसरे से जुड़ गए.
असल में आंखों ही आंखों में तबादला-ए-ख़याल, हमारी सभ्यता में संवाद का एक हल्का-फुलका ज़रिया रहा है.
पर, यक़ीन जानिए, आंखों-आंखों में बातें होना हमेशा अहम तजुर्बा होता है. हम कई बार नज़रें टकराने के बाद किसी के बारे में कोई राय क़ायम कर लेते हैं.
ये सोचते हैं कि जो शख़्स आंखों के सामने है, उसने बहुत कुछ छुपा रखा है. मज़े की बात ये कि हमें लगातार किसी का देखे जाना भी चुभता है.
पर, भीड़ के बीच से गुज़रते हुए अगर किसी की निगाह आप पर न पड़े, तो बहुत ख़राब लगता है.
आंखों-आंखों में बातों के बारे में हम इतना कुछ हम अपने रोज़मर्रा के तजुर्बों से जानते हैं. वैज्ञानिकों ने इसके आगे की भी रिसर्च की है.
ख़ास तौर से मनोवैज्ञानिकों और तंत्रिका विज्ञान के विशेषज्ञों यानी न्यूरोसाइंटिस्ट ने भी इस बारे में कई तजुर्बे किए हैं.
ये सभी इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि आंखों के टकराने के बाद होने वाला संवाद बहुत ताक़तवर होता है. इसमें कई गहरे राज़ छुपे हो सकते हैं.
लोग किसी से नज़रें टकराने के बाद अपने बारे में अनजाने में बहुत कुछ बता जाते हैं. दूसरों के बारे में सोच डालते हैं.
मसलन, घूरती हुई आंखें अक्सर हमारा ध्यान खींच लेती हैं. उनकी तरफ़ देखते हुए हम आस-पास की बाक़ी बातों की अनदेखी कर देते हैं.
किसी की घूरती निगाहों से हमारी नज़रें टकराती हैं, तो हमारे ज़हन में एक साथ बहुत से ख़याल आते हैं. हम उस इंसान के बारे में ज़्यादा सोचने लगते हैं.
इस तरह से हम ख़ुद के बारे में भी ज़्यादा सजग हो जाते हैं. आप अगर किसी बंदर, गोरिल्ला, या चिंपैंजी से नज़रें टकराने के बाद इस बात को और गहराई से महसूस करेंगे.
कई बार तो किसी पेंटिंग की आंखों से आंखें टकराने पर ऐसा लगता है कि वो पेंटिंग हमारे किरदार की समीक्षा कर रही है. हमारे ज़हन में ख़यालों की सुनामी आ जाती है.
हम अपने बारे में सजग हो जाते हैं. हम किसी और की दिलचस्पी के केंद्र में हैं, ये जानते ही हमारा दिमाग़ चौकन्ना हो जाता है. इससे हमारा ध्यान भटक जाता है.
ये बात कई तजुर्बों में साबित हुई है. जापान में हुए एक रिसर्च में देखा गया कि किसी वीडियो में भी घूरती हुई आंखों से नज़रें टकराने के बाद लोगों का ध्यान भंग हो गया.
किसी का घूरना हमारी याददाश्त पर भी असर डालता है.
आपने रूमानी उपन्यासों से लेकर फ़िल्मों तक में ये पढ़ा, सुना या देखा होगा कि किसी से नज़रें टकराने के बाद कोई घबरा गया. जो काम कर रहा था वो भूल गया.
ऐसा, असल में इसलिए होता है कि किसी से निगाहें चार होने के बाद हम जिस काम में लगे होते हैं, उससे हमारा ध्यान भंग हो जाता है.
ये मंज़र किसी फ़िल्म का भले लगे, पर असल दुनिया में भी हम सब इस तजुर्बे से गुज़रते हैं. और नज़रें चार होते है, आस-पास की दुनिया धुंधली हो जाती हैं.
साफ़ दिखती है, तो वो नज़र, जो आपकी आंखों से टकराई है. ऐसा लगता है कि जिन लोगों के नैना लड़े हैं, वो कुछ पलों के लिए ज़हनी तौर पर एक-दूसरे से जुड़ गए.
असल में आंखों ही आंखों में तबादला-ए-ख़याल, हमारी सभ्यता में संवाद का एक हल्का-फुलका ज़रिया रहा है.
पर, यक़ीन जानिए, आंखों-आंखों में बातें होना हमेशा अहम तजुर्बा होता है. हम कई बार नज़रें टकराने के बाद किसी के बारे में कोई राय क़ायम कर लेते हैं.
ये सोचते हैं कि जो शख़्स आंखों के सामने है, उसने बहुत कुछ छुपा रखा है. मज़े की बात ये कि हमें लगातार किसी का देखे जाना भी चुभता है.
पर, भीड़ के बीच से गुज़रते हुए अगर किसी की निगाह आप पर न पड़े, तो बहुत ख़राब लगता है.
आंखों-आंखों में बातों के बारे में हम इतना कुछ हम अपने रोज़मर्रा के तजुर्बों से जानते हैं. वैज्ञानिकों ने इसके आगे की भी रिसर्च की है.
ख़ास तौर से मनोवैज्ञानिकों और तंत्रिका विज्ञान के विशेषज्ञों यानी न्यूरोसाइंटिस्ट ने भी इस बारे में कई तजुर्बे किए हैं.
ये सभी इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि आंखों के टकराने के बाद होने वाला संवाद बहुत ताक़तवर होता है. इसमें कई गहरे राज़ छुपे हो सकते हैं.
लोग किसी से नज़रें टकराने के बाद अपने बारे में अनजाने में बहुत कुछ बता जाते हैं. दूसरों के बारे में सोच डालते हैं.
मसलन, घूरती हुई आंखें अक्सर हमारा ध्यान खींच लेती हैं. उनकी तरफ़ देखते हुए हम आस-पास की बाक़ी बातों की अनदेखी कर देते हैं.
किसी की घूरती निगाहों से हमारी नज़रें टकराती हैं, तो हमारे ज़हन में एक साथ बहुत से ख़याल आते हैं. हम उस इंसान के बारे में ज़्यादा सोचने लगते हैं.
इस तरह से हम ख़ुद के बारे में भी ज़्यादा सजग हो जाते हैं. आप अगर किसी बंदर, गोरिल्ला, या चिंपैंजी से नज़रें टकराने के बाद इस बात को और गहराई से महसूस करेंगे.
कई बार तो किसी पेंटिंग की आंखों से आंखें टकराने पर ऐसा लगता है कि वो पेंटिंग हमारे किरदार की समीक्षा कर रही है. हमारे ज़हन में ख़यालों की सुनामी आ जाती है.
हम अपने बारे में सजग हो जाते हैं. हम किसी और की दिलचस्पी के केंद्र में हैं, ये जानते ही हमारा दिमाग़ चौकन्ना हो जाता है. इससे हमारा ध्यान भटक जाता है.
ये बात कई तजुर्बों में साबित हुई है. जापान में हुए एक रिसर्च में देखा गया कि किसी वीडियो में भी घूरती हुई आंखों से नज़रें टकराने के बाद लोगों का ध्यान भंग हो गया.
किसी का घूरना हमारी याददाश्त पर भी असर डालता है.
आपने रूमानी उपन्यासों से लेकर फ़िल्मों तक में ये पढ़ा, सुना या देखा होगा कि किसी से नज़रें टकराने के बाद कोई घबरा गया. जो काम कर रहा था वो भूल गया.
ऐसा, असल में इसलिए होता है कि किसी से निगाहें चार होने के बाद हम जिस काम में लगे होते हैं, उससे हमारा ध्यान भंग हो जाता है.
Comments
Post a Comment